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Tuesday, 20 August 2019

Tuesday, August 20, 2019

Indian History books Free Download pdf in Hindi


indian history books free download pdf in hindi

Dear Friends, आज के अपने इस लेख में मैं आपको indian history books free download pdf in hindi उपलब्ध करवाने जा रहा हूँ| यह pdf प्रतियोगिता परीक्षा को crack करने में आप सभी students के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है| वैसे भी अभ्यर्थियों के लिए यह चुनाव करना बहुत मुश्किल रहता है कि सबसे बढ़िया study PDF या materials उन्हें कहा से प्राप्त हो सकता है तो हमारा इस वेबसाइट बनाने का मुख्य उद्देश्य ही आप सभी को best study PDF/materials उपलब्ध करवाना है जिसकी लिंक हम नीचे उपलब्ध करा रहे है, आप यहा से सरलतम रुप से उपलब्ध जानकारी को हिन्दी भाषा मे पढ सकते है, और अपनी तैयारी को औऱ भी मजबूत कर सकते है।

यदि भारत के इतिहास (history books free download pdf) को दुनिया के इतिहास के महान अध्यायों में से एक कहा जाता है, तो इसे अतिशयोक्ति नहीं कहा जा सकता है। भारतीय इतिहास की खासियत यह है कि यह स्वयं को खोजने की निरंतर प्रक्रिया में लगा रहता है और बढ़ता रहता है, इसलिए जो लोग इसे समझने की कोशिश करते हैं, वे इसे मायावी पाते हैं।

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत:

  • हडप्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल

  • हडप्पाकालीन प्रमुख स्थल

  • धार्मिक आन्दोलन

  • पुराण युग

  • जैन धर्म

  • बौद्ध धर्म

  • सिकन्दर का भारत पर आक्रमण

  • मौर्य साम्राज्य (322-184 ईं पू)

  • मौर्योत्तर काल

  • भारतीय संस्कृति पर यूनानी प्रभाव

  • गुप्त वंश

  • मध्य कालीन इतिहास

  • भारत मे तुर्को का आक्रमण

  • दिल्ली सल्तनत (1206-1526)

  • खिलजी वंश

  • लोदी वंश

  • पुनर्जागरण

  • फ्रांस की क्रान्ति

  • इंग्लैण्ड की क्रान्ति

  • औद्योगिक क्रान्ति

  • रुसी क्रान्ति प्रथम

  • रुसी क्रान्ति द्वितीय

  • विश्न युद्ध आदि।

मध्यकालीन इतिहास (Medieval History in Hindi)

  • पाल सम्राज्य

  • प्रतिहार

  • राष्ट्रकूट

  • प्रांतिक प्रथम

  • राजराज प्रथम

  • चोल साम्राज्य

  • राजेंद्र प्रथम

  • चोल कालीन शासन प्रणाली

  • चोल शासकों की प्रशासनिक इकाई

  • चोल काल के प्रमुख कर

  • कुछ अन्य छोटे राजवंश
नीचे हम जितनी भी लिंक आपको उपलब्ध कराएगे वह इसी भारतीय इतिहास से सम्बन्धित नोट्स और सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी की होगी आप उस पर क्लिक करके अपनी जरुरत के मटेरियल को पढ अथवा डाउनलोड कर सकते है|

आप सभी प्रतियोगी विद्यार्थी निचे दिए गए डाउनलोड links पर click करके आसानी से इस indian history books free PDF in Hindi को डाउनलोड करके अपनी पढाई अच्छे से कर सकते है|

Book Name : Indian History Book 2019
Language : Hindi
Format : PDF
Quality : PDF
Pages : 93 & 16
Credit By : Sankalp Coaching

Indian History book free pdf part 1 Indian History book free pdf Part 2 Indian History By The Institute

Note : आशा है की आप सभी को प्राचीन भारत का इतिहास बुक 2019 pdf आपके परीक्षा के लिए उपयोगी साबित होगी | अगर आप सभी को परीक्षा मंथन प्रकाशन द्वारा बनाई गई पुस्तक अच्छी लगी तो हमें comment करके ज़रुर बताए |

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Friday, 9 August 2019

Friday, August 09, 2019

Indian History in Hindi (bharat ka itihas in hindi pdf)


indian history in hindi (bharat ka itihas in hindi pdf)

भारतीय इतिहास (Indian history in Hindi)

Dear Friends, आज के अपने इस लेख में मैं आपको indian history in hindi (bharat ka itihas in hindi pdf) उपलब्ध करवाने जा रहा हूँ| यह pdf प्रतियोगिता परीक्षा को crack करने में आप सभी students के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है| वैसे भी अभ्यर्थियों के लिए यह चुनाव करना बहुत मुश्किल रहता है कि सबसे बढ़िया study PDF या materials उन्हें कहा से प्राप्त हो सकता है तो हमारा इस वेबसाइट बनाने का मुख्य उद्देश्य ही आप सभी को best study PDF/materials उपलब्ध करवाना है |

यदि भारत के इतिहास (Indian History)को दुनिया के इतिहास के महान अध्यायों में से एक कहा जाता है, तो इसे अतिशयोक्ति नहीं कहा जा सकता है। भारतीय इतिहास की खासियत यह है कि यह स्वयं को खोजने की निरंतर प्रक्रिया में लगा रहता है और बढ़ता रहता है, इसलिए जो लोग इसे समझने की कोशिश करते हैं, वे इसे मायावी पाते हैं।

इस अद्भुत उपमहाद्वीप का इतिहास लगभग 75,000 साल पुराना है और इसका प्रमाण होमो सेपियन्स की मानवीय गति विधि से मिलता है। यह आश्चर्य की बात है कि 5,000 साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने कृषि और व्यापार के आधार पर एक शहरी संस्कृति विकसित की थी।

युगों के अनुसार, भारत का इतिहास इस प्रकार है: पूर्व-ऐतिहासिक काल पाषाण युग:

पूर्व-ऐतिहासिक काल पाषाण युग:

पाषाण युग 500,000 से 200,000 साल पहले शुरू हुआ था और तमिलनाडु में हाल ही में हुई खोजों से इस क्षेत्र की सबसे पहली मानवीय उपस्थिति का पता चलता है। 200,000 साल पुराने मानव निर्मित हथियार भी देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से से खोजे गए हैं।

पीतल

आयु: कांस्य युग भारतीय उपमहाद्वीप में 3,300 ईसा पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता के साथ शुरू हुआ। प्राचीन भारत का एक ऐतिहासिक हिस्सा होने के अलावा, यह मेसोपोटामिया और प्राचीन मिस्र के साथ दुनिया की शुरुआती सभ्यताओं में से एक है। इस युग के लोगों ने धातु विज्ञान और हस्तशिल्प में नई तकनीकों का विकास किया और तांबा, पीतल, सीसा और टिन का उत्पादन किया।

प्रारंभिक ऐतिहासिक काल वैदिक काल

आर्यों ने सबसे पहले भारत पर आक्रमण किया था। वे 1,500 ईसा पूर्व के आसपास उत्तर से आए थे और अपने साथ मजबूत सांस्कृतिक परंपराओं लेकर आए थे। संस्कृत उनके द्वारा बोली जाने वाली सबसे पुरानी भाषाओं में से एक थी और इसका उपयोग वेदों को लिखने में भी किया जाता है जो 12 वीं ईसा पूर्व की हैं और सबसे पुराने ग्रंथ माने जाते हैं।

मेसोपोटामिया और मिस्र के ग्रंथों के बाद वेदों को सबसे पुराना ग्रंथ माना जाता है। उपमहाद्वीप में वैदिक काल लगभग 1,500-500 ईसा पूर्व तक रहा और प्रारंभिक भारतीय समाज में हिंदू धर्म और अन्य सांस्कृतिक आयामों की नींव रखी। आर्यों ने वैदिक सभ्यता को पूरे उत्तर भारत में फैलाया, विशेष कर गंगा के मैदानों में।

महाजन पद:

इस अवधि में सिंधु घाटी सभ्यता के बाद भारत में शहरी-करण का दूसरा सबसे बड़ा उदय हुआ। 'महा' शब्द का अर्थ है महान और 'जनपद' का अर्थ है एक जनजाति का आधार। वैदिक युग के अंत तक, पूरे उपमहाद्वीप में कई छोटे राजवंश और राज्य पनपने लगे। यह 1,000 ईसा पूर्व के बौद्ध और जैन साहित्य में भी वर्णित है। 500 ईसा पूर्व तक, 16 गणराज्यों या कहें, महाजनपद की स्थापना की गई थी, जैसे कासी, कोसल, अंगा, मगध, वाजजी या व्रजी, मल्ल, चेदि, वत्स या यामसा, कुरु, पांचला, मत्स्य, सुरसेना, असाका, अवंती, गांधार। और कम्बोज

फारसी और ग्रीक विजय

उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र का अधिकांश भाग, जो वर्तमान में पाकिस्तान और अफग़ानिस्तान है, सी में फारसी अचमेनिद साम्राज्य के डेरियस द ग्रेट के शासन में आया था। 520 ईसा पूर्व और लगभग दो शताब्दियों तक जीवित रहे। 326 ईसा पूर्व में, अलेक्जेंडर ने एशिया माइनर और अचमेनिद साम्राज्य पर विजय प्राप्त की, फिर भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी सीमा पर पहुंचे, राजा पोरस को हराया और पंजाब के अधिकांश क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया।

मौर्य साम्राज्य: मौर्य साम्राज्य

मौर्य राजवंश 322-185 ईसा पूर्व से चला और यह प्राचीन भारत के राजनीतिक और सैन्य मामलों में भौगोलिक रूप से व्यापक और बहुत शक्तिशाली राज्य था। चंद्रगुप्त मौर्य ने इसे मगध में स्थापित किया, जो वर्तमान बिहार में, उपमहाद्वीप में है और यह महान राजा अशोक के शासन में बहुत आगे बढ़ा।

प्राचीन भारतीय इतिहास की घटनाएँ

प्रागैतिहासिक काल: ४००००० ईसा पूर्व -१००० ईसा पूर्व: यह वह समय था जब केवल भोजन एकत्र करने वाले मानव ने अग्नि और चक्र की खोज की थी।

सिंधु घाटी सभ्यता: 2500 ईसा पूर्व -1500 ईसा पूर्व: इसका नाम सिंधु नदी से आया था और यह खेती से विकसित हुआ था। यहां लोगों ने प्राकृतिक संसाधनों की भी पूजा की।

महाकाव्य युग: १००० ईसा पूर्व -६०० ईसा पूर्व: इस अवधि में वेद संकलित किए गए थे और वर्ण आर्य और दास जैसे भिन्न थे।

हिंदू धर्म और परिवर्तन: 600 ई.पू.-322 ई.पू.: इस दौरान जाति व्यवस्था बहुत सख्त हो गई थी और यही वह समय था जब महावीर और बुद्ध का आगमन हुआ और उन्होंने जातिवाद के खिलाफ विद्रोह किया। इस अवधि के दौरान महाजनपद का गठन किया गया और मगध बिम्बिसार, अजात शत्रु, शिसुनुंगा और नंदा राजवंशों के शासन में आया।

मौर्य काल: 322 ई.पू.-185 ईसा पूर्व: चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित इस साम्राज्य के तहत, पूरे उत्तर भारत था और बिन्दुसार ने इसे और बढ़ाया। इस अवधि में कलिंग युद्ध के बाद, राजा अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया।

आक्रमण: 185 ई.पू.-320 ई।: इस काल में बैक्ट्रियन, पार्थियन, शक और कुषाण के आक्रमण हुए। मध्य एशिया व्यापार के लिए खोला गया, सोने के सिक्कों का चलन और शक युग की शुरुआत।

दक्कन और दक्षिण: 65 ई.पू.-250 ई।: इस काल में दक्षिण में चोल, चेरा और पंड्या का शासन था और इस दौरान अजंता एलोरा की गुफाएँ बनीं, संगम साहित्य और ईसाई धर्म भारत में आया।

गुप्त साम्राज्य: 320 ई। - 520 इस अवधि में चंद्रगुप्त प्रथम ने गुप्त साम्राज्य की स्थापना की, शास्त्रीय युग उत्तर भारत में आया, समुद्रगुप्त ने अपने वंश का विस्तार किया और चंद्रगुप्त द्वितीय ने शाक के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इस युग में ही शकुंतलम और कामसूत्र की रचना हुई। आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान में अद्भुत काम किया और भक्ति पंथ भी इस समय उभरा।

छोटे राज्यों की अवधि: 500 ई.-606 ई।: इस युग में मध्य भारत और ईरान में हूणों का प्रवास देखा गया।

उत्तर में कई राजवंशों के बीच संघर्ष के कारण कई छोटे राज्य बनाए गए थे।

हर्षवर्धन: 606 ई -647 ई।: हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान, प्रसिद्ध चीनी यात्री हेन त्सांग ने भारत की यात्रा की। हूणों के हमले से हर्षवर्धन का राज्य कई छोटे राज्यों में बंट गया।

यह वह समय था जब दक्कन और दक्षिण बहुत शक्तिशाली हो गए थे।

दक्षिण राजवंश: 500 ई। - 750 ईस्वी:: पनापा और पारसियों के चालुक्य, पल्लव और पांड्य राज्य इस अवधि के दौरान भारत आए।

चोल साम्राज्य: 9 वीं शताब्दी ई -13 वीं शताब्दी ईस्वी: विजय साम्राज्य द्वारा स्थापित चोल साम्राज्य ने समुद्र नीति को अपनाया।

अब मंदिर सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र बनने लगे और द्रविड़ भाषा का विकास हुआ।

उत्तरी साम्राज्य: 750 ई.-1206 ई।: इस समय राष्ट्रकूट शक्तिशाली हो गए, प्रतिहार ने अवंती और पलास ने बंगाल पर शासन किया। इस अवधि में राजपूत वंशों का उदय हुआ।

खजुराहो, कांचीपुरम, पुरी में मंदिरों का निर्माण किया गया और लघु चित्रों की शुरुआत हुई। इस दौरान तुर्क हमले हुए।

मध्यकालीन भारतीय इतिहास

मुगल साम्राज्य: तैमूर के वंशज बाबर और फरगाना वेलोर के चंगेज खान, जो अब उज्बेकिस्तान है, ने 1526 में खैबर दर्रे को पार किया और मुगल साम्राज्य की स्थापना की, जहां अब यह अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश है। 1600 तक, मुगल वंश ने ज्यादातर भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया। 1700 के बाद, यह राजवंश घटने लगा और आखिरकार 1857 में भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के समय समाप्त हो गया।

आधुनिक भारतीय इतिहास

औपनिवेशिक काल: यूरोपीय शक्तियों ने 16 वीं शताब्दी में पुर्तगाल, नीदरलैंड, फ्रांस और ब्रिटेन से भारत में अपने व्यापार केंद्र स्थापित किए। बाद में, आंतरिक मतभेदों का लाभ उठाते हुए, उन्होंने अपने उपनिवेश स्थापित किए।
अंग्रेजों

राज: जब 1600 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में आई, तो महारानी विक्टोरिया के शासन का ब्रिटिश शासन यहीं से शुरू हुआ। यह 1857 में भारत की आजादी की पहली लड़ाई के बाद समाप्त हुआ।

1857 के प्रसिद्ध व्यक्ति:

बहादुर शाह जफर
अधिकांश भारतीय विद्रोहियों ने बहादुर शाह ज़फर को भारत का राजा चुना और वे उसके अधीन हो गए। वे अंग्रेजों की साजिश के सामने टिक नहीं पाए। उनके पतन से भारत में तीन सदी पुराने मुगल शासन का अंत हुआ।

बख्त खान:
बख्त खान, जो ईस्ट इंडिया कंपनी में सूबेदार थे, ने रोहिला सैनिकों की एक सेना का निर्माण किया। मई 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ मेरठ में सैनिकों के विद्रोह के बाद वह दिल्ली में सिपाही सेना के कमांडर बन गए।

मंगल
पांडे: मंगल पांडे, जो 34 वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री का हिस्सा थे, को 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में एक वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारी पर हमला करने के लिए जाना जाता है। इस घटना को भारत के स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत माना जाता है।

नाना साहिब: निर्वासित मराठा पेशवा बाजी राव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहिब ने कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किया।

रानी लक्ष्मीबाई:
तात्या टोपे के साथ मिलकर रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश सैनिकों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी। 17 जून 1858 को ग्वालियर के फूल बाग इलाके के पास उन्होंने अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी जान दे दी।

तात्या
टोपे: नाना साहिब के करीबी सहयोगी और सेनापति तात्या टोपे ने रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर अंग्रेजों का मुकाबला किया।

वीर कुंवर सिंह:
जगदीशपुर के राजा, जो वर्तमान में बिहार के भोजपुर जिले का हिस्सा थे, ने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र बलों का नेतृत्व किया।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और महात्मा

गांधी: 20 वीं शताब्दी में, महात्मा गांधी ने लाखों लोगों का नेतृत्व किया और 1947 में स्वतंत्रता के लिए एक अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया।

स्वतंत्रता और विभाजन:
ब्रिटिश विभाजन और शासन नीति के कारण, पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे प्रांतों में हिंदू और मुसलमानों के बीच धार्मिक तनाव बढ़ गया है। महात्मा गांधी ने भी दोनों धार्मिक समुदायों से एकता बनाए रखने की अपील की। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, कमजोर अर्थव्यवस्था से जूझ रहे अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का फैसला किया, जिसके कारण अंतरिम सरकार का गठन हुआ। आखिरकार, भारत और पाकिस्तान का विभाजन हो गया और इस क्षेत्र ने 1947 में ब्रिटिश अधिपत्य के साथ स्वतंत्रता प्राप्त कर ली।

स्वतंत्रता के बाद की अवधि:
कई सभ्यताओं जैसे कि यूनानियों, रोमन और मिस्र ने वृद्धि और गिरावट देखी। भारतीय सभ्यता और संस्कृति इससे अछूती रही। उत्तराधिकार में इस देश पर कई आक्रमण हुए, कई राज्य आए और विभिन्न हिस्सों पर शासन किया, लेकिन भारत-वर्ष की अदम्य भावना को हराया नहीं गया।

आज, भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और दुनिया में सबसे जीवंत गणराज्य के रूप में देखा जाता है। यह एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति और दक्षिण एशिया का एक प्रभावशाली देश है।

भारत एशिया में दूसरा सबसे बड़ा देश है और दुनिया में सातवाँ सबसे बड़ा और जनसंख्या के हिसाब से दूसरा सबसे बड़ा देश है। इसमें एशिया का एक तिहाई और मानव जाति का सातवाँ हिस्सा है।

Note : आशा है की आप सभी को प्राचीन भारत का इतिहास बुक 2019 pdf आपके परीक्षा के लिए उपयोगी साबित  होगी | अगर आप सभी को परीक्षा मंथन प्रकाशन द्वारा बनाई गई पुस्तक अच्छी लगी तो हमें comment करके ज़रुर बताए |

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Sunday, 4 August 2019

Sunday, August 04, 2019

Latest माजिद हुसैन जियोग्राफी इन हिंदी PDF download (Geography of India byMajid Husain)


Geography of India by Majid Husain

Dear Friends, आज के अपने इस लेख में मैं आपको माजिद हुसैन जियोग्राफी इन हिंदी pdf (Geography of India by Majid Husain) for Competitive Exams उपलब्ध करवाने जा रहा हूँ जो “MacGraw Hill publication” द्वारा तैयार किया गया है| यह pdf प्रतियोगिता परीक्षा को crack करने में आप सभी students के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है| वैसे भी अभ्यर्थियों के लिए यह चुनाव करना बहुत मुश्किल रहता है कि सबसे बढ़िया study PDF या materials उन्हें कहा से प्राप्त हो सकता है तो हमारा इस वेबसाइट बनाने का मुख्य उद्देश्य ही आप सभी को best study PDF/materials उपलब्ध करवाना है |

GEOGRAPHY OF INDIA (भारत का भूगोल) से सम्बन्धित महत्वपूर्ण Notes PDF मे लेकर आया जो आप नीचे दिए गए डाउनलोड बटन पर Click करके माजिद हुसैन जियोग्राफी इन हिंदी pdf (GEOGRAPHY OF INDIA by Majid Husain IN HINDI PDF) बहुत ही सरतम तरीके से अपने Mobile/PC/Tablet download करके Save कर सकते है और अपनी तैयारी से सम्बन्धित Questions और Notes आपके पास मौजूद रुप से सूगम और सरतम तरीके से आपकी तैयारी को नई दिशा दे सकेंगे

Majid Hussain Geography 5th Edition Book उन सभी छात्रों या प्रतियोगी उम्मीदवारों को पढना चाहिए जो SSC Graduate Level Exams— CPO Sub-Inspector, Section Officer(Audit), Tax Assistant (Income Tax & Central Excise), CGL, CHSL, Section, UPSSSC (उत्तर प्रदेश अधिनस्थ सेवा चयन बोर्ड), SSC Matric Level Exam, CISF, Officer (Commercial Audit), Banks-IBPS/SBI  PO Clerks, Railways Group C & D, KVS PRT-TGT-PGT, SSC Data Entry Operator, Intelligence Bureau(IB) तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे है।

भारतीय भूगोल किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए एक प्रमुख विषय है, यह न केवल विशाल पाठ्यक्रम बल्कि विज्ञान के अन्य विषयों के साथ प्रासंगिकता के कारण काफी कठिन माना जाता है, जिसमें भौगोलिक अवधारणाओं के विभिन्न आयाम शामिल हैं। इसलिए, इस विषय के महत्व को ध्यान में रखते हुए हमने भारतीय भूगोल पर एक सामान्य अध्ययन सामग्री बनाई है जिसमें सामान्य भूगोल और शारीरिक विशेषताओं, जलवायु, मृदा और वनस्पति, ड्रेनेज सिस्टम, आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल जैसे पांच प्रमुख वर्ग शामिल हैं।
Majid Hussain Geography PDF Book Main Content
  • The Universe and the Solar System

  • Geomorphology

  • Climatology

  • Oceanography

  • Biogeography

  • Facts about the World/Continents/Countries

  • World Economic Geography

  • Agriculture

  • Human Geography

यह Book, UPSC Syllabus को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। माजिद हुसैन जियोग्राफी इन हिंदी pdf (Geography of India by Majid Husain) UPSC Exam के पैटर्न पर आधारित है. Geography of India by Majid Husain Book PDF Download करने के लिये नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करे.

माजिद हुसैन जियोग्राफी इन हिंदी pdf download
Buy Majid Hussain Geography PDF in Hindi
Book Name: Geography of India by Majid Hussain
  • Format: PDF

  • Page: 483

  • Size: 84 Mb

  • Language: English

  • Credit: Tata McGraw Hill

  • Scanned by: freeupscmaterial
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Thursday, 1 August 2019

Thursday, August 01, 2019

भारत का भूगोल Geography of India in Hindi (bharat ka bhugol)

भारत का भूगोल Geography of India in Hindi

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राज्यों के नाम निम्नवत हैं- (कोष्टक में राजधानी का नाम)

भारत के २९ राज्यों और ७ केंद्र शासित प्रदेश

  1. अरुणाचल प्रदेश (इटानगर)

  2. असम (दिसपुर)

  3. उत्तर प्रदेश (लखनऊ)

  4. उत्तराखण्ड (देहरादून)

  5. ओड़िशा (भुवनेश्वर)

  6. आंध्र प्रदेश (अमरावती)

  7. कर्नाटक (बंगलोर)

  8. केरल (तिरुवनंतपुरम)

  9. गोआ (पणजी)

  10. गुजरात (गांधी नगर)

  11. छत्तीसगढ़ (रायपुर)

  12. जम्मू और कश्मीर (श्रीनगर/जम्मू)

  13. झारखंड (राँची)

  14. तमिलनाडु (चेन्नई)

  15. तेलंगाना (हैदराबाद)

  16. त्रिपुरा (अगरतला)

  17. नागालैंड (कोहिमा)

  18. पश्चिम बंगाल (कोलकाता)

  19. पंजाब (चंडीगढ़†)

  20. बिहार (पटना)

  21. मणिपुर (इम्फाल)

  22. मध्य प्रदेश (भोपाल)

  23. महाराष्ट्र (मुंबई)

  24. मिज़ोरम (आइजोल)

  25. मेघालय (शिलांग)

  26. राजस्थान (जयपुर)

  27. सिक्किम (गंगटोक)

  28. हरियाणा (चंडीगढ़†)

  29. हिमाचल प्रदेश (शिमला)

  30. केन्द्रशासित प्रदेश

  31. अंडमान व निकोबार द्वीपसमूह(पोर्ट ब्लेयर)

  32. चंडीगढ़†* (चंडीगढ़)

  33. दमन और दीव* (दमन)

  34. दादरा और नागर हवेली* (सिलवासा)

  35. पॉण्डिचेरी* (पुडुचेरी)

  36. लक्षद्वीप* (कवरत्ती)

  37. दिल्ली (नई दिल्ली)
चंडीगढ़ एक केंद्र-शासित प्रदेश और पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों की राजधानी है।

भारत का नामकरण (NOMENCLATURE OF INDIA)

वायुपुराण में भारत वर्ष शब्द का उल्लेख मिलता है जो सम्राट द्वारा विजित क्षेत्र को कहा जाता था. राजा दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम पर देश का नाम-करण हुआ. पर्शिया (आधुनिक ईरान) के लोगों ने सबसे पहले सिंधु घाटी से प्रवेश किया.

ये लोग सिंधु का बदला रूप हिंदू यहाँ के निवासियों के लिए प्रयोग करते थे. हिंदुओं के देश को हिंदुस्तान नाम दिया गया. आर्य जब भारत आये तो वे बहुत सारे कबीलों के रूप में देश के विभिन्न क्षेत्रों में फैल गये जिसे आर्यावर्त (आर्यों का देश) के नाम से जाना गया.

जैन पौराणिक कथाओं के अनुसार हिंदू और बौद्ध ग्रंथों में भारत हेतु जम्बुद्वीप शब्द का प्रयोग किया गया है. भारत के लिए प्रयुक्त इंडिया शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के इंडोस से हुआ है. फ़्रांसीसी प्रभाव के कारण अँग्रेज़ ने इंदे को आधार मानकर इंडिया नाम-करण किया.

जेम्स अलेक्जेंडर ने अपने विवरण में हिंदू का ह शब्द हटाकर देश को इंदु नाम से संबोधित किया था, फिर बाद में बदलकर इंडिया हो गया.

भारत की स्थिति व विस्तार (INDIA’S LOCATION & EXTENSION)

भारत चतुष्कोण आकृति वाला देश है. यह दक्षिण एशिया के मध्य में स्थित है. इसके पूर्व में इंडो-चीन प्रायद्वीप एवं पश्चिम में अरब प्रायद्वीप स्थित है. भारत अक्षांशीय दृष्टि से उत्तरी गोलार्द्ध का देश है तथा देशंतरीय दृष्टि से पूर्वी गोलार्द्ध के मध्यवर्ती स्थिति में है.

भारत का अक्षांशीय व देशांतर विस्तार में लगभग 30 डिग्री अंतर है. उत्तर- दक्षिण दिशा में इसकी लम्बाई 3214 किमी. है. भारत का देशांतरीय विस्तार कच्छ के रण से अरुणाचल प्रदेश तक पूर्व- पश्चिम दिशा में इसकी चौड़ाई 2933 किमी. है.

विषुवत व्रत के निकट स्थित भारतीय क्षेत्रों में दिन और रात की अवधि में अधिकतम 45 मिनट का अंतर है, जबकि उत्तरतम सीमा पर यह अंतर 5 घंटे का हो जाता है.

प्रथ्वी 24 घंटे में अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व दिशा में 360 डिग्री देशांतर घूम जाती है. इस प्रकार 1 डिग्री देशांतर पार करने के लिए 4 मिनट का समय लगता है.

समय के अंतर की इस कमी को दूर करने के लिए अन्य देशों की तरह भारत ने भी एक मानक मध्यान्ह रेखा का चयन किया है. मानक मध्यान्ह रेखा पर जो स्थानीय समय होता है, उस समय को देश का मानक समय माना जाता है.

विश्व के देशों में आपसी समझ के अंतर्गत मानक याम्योत्तर को 7 डिग्री 30 मिनट देशांतर के गुणांक पर चुना जाता है. यही कारण है कि 82 डिग्री 30 मिनट पूर्वी देशांतर रेखा को भारत की मानक याम्योत्तर चुना गया है.

भारत का मानक समय इलाहाबाद के निकट मिर्जापुर से गुजरने वाली 82 डिग्री 30 मिनट पूर्वी देशांतर माना गया है जो 5 राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश से होकर गुजरती है. 

भारत का भूगोल Geography of India in Hindi

भारत की जलवायु

जलवायु का अध्ययन जलवायु विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है. जलवायु विज्ञान के अंतर्गत वायुमंडलीय दशाओं में मौसम व जलवायु का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है. मौसम वायुमंडल का अल्पकालिक अवस्था का अध्ययन है जबकि दीर्घकालिक अवस्था का ज्ञान जलवायु के अंतर्गत होता है. 30 वर्ष से अधिक एक विशाल क्षेत्र में मौसम की अवस्थाओं व विविधताओं का कुल योग जलवायु कहलाती है.

भारतीय मानसून की प्रकृति (Nature of Indian Monsoon

1). मानसून का आरम्भ तथा उसका अग्रसरण

19 वीं सदी के अंत में यह व्याख्या की गयी थी कि गर्मी के महीनों में स्थल व समुद्र का विभेदी तापन ही मानसून पवनों के उपमहाद्वीप की ओर चलने के लिए अनुकूल स्थिति उत्पन्न करती है. अप्रैल व मई के महीने में जब सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत चमकता है.

हिंद महासागर के उत्तर में स्थित विशाल भू-खंड बहुत अधिक गर्म हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उपमहादीप के उत्तर- पश्चिमी भाग में एक गहन न्यून दाब क्षेत्र विकसित हो जाता है.

दक्षिणी- पश्चिमी मानसून केरल तट पर 1 जून तक पहुँचता है और जल्दी ही 10 और 13 जून के बीच ये आद्र पवनें मुंबई व कोलकाता तक पहुँच जाती हैं. 15 जुलाई तक संपूर्ण उप्माहदीप दक्षिण- पश्चिम मानसून से घिर जाता है.

2). वर्षावाही तंत्र व मानसूनी वर्षा

भारत में वर्षा लाने वाले 2 तंत्र होते हैं, पहला उष्ण कटीबंधीय अवदाब है, जो बंगाल की खाड़ी या उससे भी आगे पूर्व में दक्षिणी चीन सागर में पैदा होता है तथा उत्तरी भारत के मैदानी भागों में वर्षा करता है.

दूसरा तंत्र अरब सागर से उठने वाली दक्षिणी- पश्चिमी मानसून धरा है जो भारत के पश्चिम घाट के साथ साथ होने वाली अधिक्तार्वर्षा पर्वतीय है, क्योंकि यह आद्र हवाओं के अवरुद्ध होकर घाट के सहारे ऊपर उठने से होती है.

3). मानसून में विच्छेद

दक्षिण- पश्चिम मानसून काल में एक बार कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद यदि एक- दो या कई सप्ताह तक वर्षा ना हो तो इसे मानसून विच्छेद कहा जाता है. ये विच्छेद भिन्न भिन्न क्षेत्रों में विभिन्न कारणों से होते हैं.

* उत्तरी भारत के विशाल मैदान में मानसून का विच्छेद उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों की संख्या कम हो जाने से होता है.

* पश्चिमी तट पर मानसून विच्छेद तब होता है जब आर्द पवनें तट के समानांतर बहने लगें.

* राजस्थान में मानसून विच्छेद तब होता है जब वायुमंडल के निम्न स्तरों पर तापमान की विलोमता वर्षा करने वाली आर्द्र पवनों का ऊपर उठने से रोक देती है.

4). मानसून का निवर्तन

मानसून के पीछे हटने या लौट जाने को मानसून का निवर्तन कहा जाता है. 1 सितम्बर के आरम्भ से उत्तर- पश्चिम भारत में मानसून पीछे हटने लगती है और 15 अक्टूबर तक यह दक्षिणी भारत को छोड़ शेष समस्त भारत से निवर्तित हो जाती है.

लौटती हुई मानसून पवनें बंगाल की खाड़ी से जल- वाष्प ग्रहण करके उत्तर- पूर्वी मानसून के रूप में तमिलनाडु में वर्षा करती हैं.

बादल का फटना (Cloud Burst)

ग्रीष्मकाल में पर्वतीय भागों पर 2 तरफ से ऊपर की ओर चढने वाली हवाओं की टकराहट पहाड़ों के ऊपर होती है, जिससे तेज आवाज़ होती है जिससे खिडकियों के शीशे तक चटक जाते हैं, इसे बादल का फटना कहा जाता है.

2 आर्द्र वायु राशियों के मिलने से सापेक्षिक आर्द्रता अचानक बढती है, तीव्र गति से संघनन होता है, मूस्लाघार वर्षा होती है, जिससे भूमि स्खलन होता है और बस्ती, खेत और सड़कें तक नष्ट हो जाती हैं.

बादल का फटना एक प्राकृतिक घटना है जो घने कपास क्षेत्र में घटित होता है जिसकी ऊंचाई सागर तल से 15 किमी. तक होती है. 16 जून 2013 को उत्तराखंड में बादल के फटने की घटना को सुनामी (Tsunami) नाम दिया गया.

भारतीय मानसून (INDIAN MONSOON)

हिंद महासागर से आने वाली दक्षिणी गोलार्द्ध की पवनें भू-मध्य रेखा को पार करके बंगाल की खाड़ी व अरब सागर में प्रवेश कर जाती हैं, जहाँ ये भारत के ऊपर विद्यमान वायु परिसंचरण में मिल जाती हैं.

भूमध्यरेखीय गर्म समुद्री धाराओं के ऊपर से गुजरने के कारण ये पवनें अपने साथ पर्याप्य मात्रा में आर्द्रता लाती हैं.

भू-मध्य रेखा को पार करके इनकी दिशा दक्षिण- पश्चिमी मानसून कहा जाता है.

हिंद महासागर से दक्षिणी गोलार्द्ध में प्रविष्ट होकर अपने दाहिनी ओर मुड़कर सामान्य रूप से जब पहली जून को भारत की दक्षिणतम छोटी महेंद्र गिरि से टकरा कर अचानक वर्षा करती हैं जिसे मानसून धमाका कहा जाता है.

दक्षिण- पश्चिम मानसून महेंद्र गिरि से टकरा कर अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी 2 शाखाओं में बंटकर समूचे देश में वर्षा करती राजस्थान पहुँचती हैं.

भारत का भूगोल Geography of India in Hindi

भारत की मिट्टी (मृदा)
पृथ्वी के घरातल पर मिट्टियाँ असंघटित पदार्थों की एक परत है, जो अपक्षय और विघटन के कारणों के माध्यम से चट्टानों और जैव पदार्थों से बनी होती है.

अपक्षय और अपरदन के कारक भू-पृष्ठ की चट्टानों को तोड़कर उसका चूर्ण बना देते हैं. इस चूर्ण में वनस्पति तथा जीव- जंतुओं के गले-सड़े अंश भी सम्मिलित हो जाते हैं, जिसे हुमस कहते हैं.

चट्टानों में उपस्थित खनिज तथा चूर्ण में मिला हुआ हुमस मिलकर पेड़- पौधों को जीवन प्रदान करता है. मिटटी की प्राकृतिक क्षमता उर्वरता (Fertility )कहलाती है.

मृदा शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा क्र शब्द सोलम से हुई है जिसका अर्थ है फर्श (Floor) है. मृदा के वैज्ञानिक अध्ययन को पेडोलोजी कहते हैं.

1). जलोद मिटटी (Alluvial Soil)
भारत में पाई जाने वाली सभी मृदाओं में जलोद मिटटी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. इसके अंतर्गत भारत का लगभग 40% क्षेत्र सम्मिलित है. जलोद मृदा संपूर्ण विशाल मैदान में पाई जाती है.

यह मृदा हिमालय और निकटवर्ती क्षेत्रों से निकलने वाली सतलज, गंगा, ब्रह्पुत्र और उनकी सहायक नदियों के अवसाद के निक्षेपित होने से बनती है.

जलोद मिति पूर्वी तटीय मैदान में विशेष रूप से महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टा प्रदेश में पाई जाती है, इसलिए इसे डेल्टा मिट्टी के नाम से भी जाना जाता है.

जलोद मृदा में पोटाश की मात्रा अधिक तथा फास्फोरस की मात्रा कम होती है और इसका रंग हलके घूसर जैसा होता है.

2). काली या रेगूर मृदा (Black Soil)
क्रिटेशियस काल में बेसाल्तिक लावा के चादरीय निक्षेप तथा उनके विखंड से काल मृदा का निर्माण हुआ है. इसमें लोहे के अंश सापेक्ष अधिक होते हैं. काली मिट्टी दक्कन के पठार की प्रमुख मृदा है. इस मिट्टी का रंग काला होने के कारण इस काली मिट्टी कहा जाता है. यह मिटटी गहरी व अपारगम्य होती है, गीली होने पर यह मिटटी फूल कर चिपचिपी हो जाती है और सूखने पर सिकुड़ जाती है.

शुष्क ऋतू में इन मृदाओं में चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं. यह ऐसा लगता है जैसे मिटटी में खुद ही जुटाई हो गयी हो. नमी के धीमे अवशोषण व नमी क्षय की धीमी गति के कारण काली मिट्टी में लंबी अवधि तक नमी बनी रहती है. जिसके कारण फसलों को गर्मी में भी नमी मिलती है.

यह मिटटी कपास की खेती के लिए उपयुक्त होती है. कपास उत्पन्न किये जाने के कारण इस मिट्टी को काली कपास मृदा भी कहा जाता है.

3). लाल- पीली मृदा (Red- Yellow Soil)
लाल- पीली मृदा का विकास उन क्षेत्रों में ज्यादा होता है जहाँ रवेदार आग्नेय चट्टानें पाई जाती हैं. पश्चिमी घाट के गिरीपद क्षेत्र की एक लंबी पट्टी में लाल दोमट मृदा पाई जाती है. इस मिट्टी का लाल रंग लौह के व्यापक विसरण के कारण होता है.

लाल मृदा जलयोजित होने के कारण पीली दिखाई पड़ती है. महीन कण वाली लाल व पीली मृदा उर्वरक होती हैं, इसके विपरीत मोटे कणों वाली मृदा अनुर्वरक होती है.

4). लैटेराईट मृदा (Laterite Soil)
लैटेराईट मृदा उच्च तापमान व भारी वर्षा के क्षेत्रों में विकसित होती है. ये मृदा उष्ण कटिबंधीय वर्षा के कारण तीव्र निक्षालन का परिणाम है. वर्षा जल के साथ चुना तथा सिलिका के कण निक्षालित हो जाते हैं तथा लोहे के ऑक्साइड व एलुमिनियम के कण मृदा में शेष रह जाते हैं.

इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा कैल्सियम की कमी होती है लेकिन लौह ऑक्साइड व पोटाश की अधिकता होती है. ये मिटटी पर्याप्त रूप से उपजाऊ नही होती. तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश व केरल में काजू जैसे वृक्षों वाली फ़सलों की खेती के लिए उपयुक्त होती है.

5). मरुस्थलीय मृदा (Desert Soil)
ये मृदा पश्चिमी राजस्थान, दक्षिणी हरियाणा, दक्षिणी पंजाब तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में पायी जाती है. हवा द्वारा उड़ाकर लाइ गयी ये रेतीली मिट्टी सिंचाई की सुविधा मिल जाने पर अच्छी उपज दे सकती है.

इनमें खनिज लवण अधिक मात्रा में पाए जाते हैं किंतु ये जल में शीघ्र घुल जाते हैं. इन मिट्टी में जीवांश की भी कमी होती है. शुष्कता अधिक होने के कारण इनका कृषि कार्यों में कम ही उपयोग होता है.

भारत की वनस्पति

पौधों के समूह को वनस्पति कहते हैं. प्राकृतिक वनस्पति में वे पौधे सम्मिलित किये जाते हैं जो मानव की सहायता के बिना जंगली अवस्था में उगते हैं. संरचना व पदार्थों में परिवर्तन करके ऐसे पौधे स्वंय को प्राकृतिक पर्यावरण के अनुकूल बना लेते हैं. प्राकृतिक वनस्पति पौधों का वह समुदाय है जिसमें लम्बे समय तक किसी प्रकार का हस्तक्षेप नही हुआ है.

मानव के हस्तक्षेप से रहित प्राकृतिक वनस्पति के उस भाग को अक्षत वनस्पति कहते हैं. सम्राट अशोक ने सड़कों के किनारे वृक्ष लगवाये थे. मुग़लों ने फलदार वृक्षों के विशिष्ट बाग़ भी लगवाये थे.

भारत में विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियाँ पाई जाती हैं. हिमालय पर्वतों पर शीतोष्ण कटिबंधीय वनस्पतियाँ उगती हैं. पश्चिमी घाट व अंडमान निकोबार दीप समूह में उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन पाए जाते हैं.

डेल्टा क्षेत्रों में उष्ण कटिबंधीय वन, मैंग्रीव तथा राजस्थान में मरुस्थलीय और अर्घ- मरुस्थलीय क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की झाड़ियाँ, कैक्टस और कांटेदार वनस्पति पाई जाती हैं. मिट्टी और जलवायु में विभिन्नता के कारण भारत के वनस्पतियों में भिन्नताएं पाई जाती हैं.

भारतीय वनस्पतियों का वर्गीकरण

1). उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)
ये वन भारत के उन भागों में पाए जाते हैं जहाँ औसत तापमान 24 डिग्री से ऊँचे तथा वर्षा 200सेमी. से अधिक
होती है. इसलिए यहाँ ऐसे वृक्ष उगते हैं जो वर्ष भर हरे रहते हैं, इसलिए इन्हें सदाबहार वन कहते हैं.

ये वन बहुत घने होते हैं, इनमें 45 से 60 मीटर तक ऊँचे वृक्ष पाए जाते हैं. इन वनों में मुख्य रूप से ताड़, महोगनी, नारियल, एबोनी, आबनूस, बाँस तथा बैत उगते हैं.

2). उष्ण कटिबंधीय पतझड़ वन (Tropical Deciduous Forests)
भारत में इस प्रकार के वन बहुतायात में पाए जाते हैं. ये वन भारत के उन भागों में पाए जाते हैं जहाँ वर्षा 100 से 200 सेमी. तक होती है.

ये वन गर्मी के प्रारंभ में ही अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं इसलिए इन्हें पतझड़ वाले या मानसूनी वन भी कहते हैं. ये वृक्ष अधिक लम्बे व सघन नही होते हैं.

इन वनों में साल, सागौन, शीशम, चंदन, आम, आंवला, महुआ व हल्दू के वृक्ष पाए जाते हैं.

इस प्रकार के वनों का विस्तार हिमालय के गिरीपद, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु के पश्चिमी घाट के पूर्वी ढालों पर, ओडिशा, पश्चिमी बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल राज्यों में हैं. इन वनों की लकड़ी मुलायम व टिकाऊ होती हैं.

3). शुष्क मरुस्थलीय कांटेदार वन (Arid Thorny Forest)
इस प्रकार के वन भारत के शुष्क भागों में जहाँ वर्षा 50 सेमी. से कम हो वहां ये वन पाए जाते है. वृक्षों को वाष्पीकरण व पशुओं से बचाने के लिए प्रकृति ने काँटे दिए हैं

इन भागों के वन छोटे- छोटे वृक्षों या कटीली झाड़ियों के रूप में होते हैं. इन वृक्षों की छाल मोटी तथा पत्तियों के साथ काँटे होते हैं

मोटी छाल वृक्षों की गर्मी से रक्षा करती हैं. इन वनों में बबूल, खजूर, नागफनी, खेजडा, रीठा, केर, बेर, आंवला व करील के वृक्ष अधिक पाए जाते हैं. भारत में इस प्रकार के वनों का विस्तार राजस्थान, गुजरात, दक्षिण- पश्चिम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा भीतरी कर्नाटक में है.

4). वेलांचाली व अनूप वन (Littoral and Swamp Forest)
इस प्रकार के वन नदियों के डेल्टाओं में पाए जाते हैं, इसलिए इसे डेल्टा वन कहते हैं. डेल्टाई भूमि समतल तथा नीची होने के कारण उनमें समुद्र का खारा जल प्रवेश कर जाता है अत इन भागों में सदाबहार के ज्वारीय वन मिलते हैं. समुद्र के खारे जल के प्रवाह से इन वृक्षों की लकड़ी कठोर तथा छाल क्षारीय हो जाती हैं. इनकी लकड़ी का उपयोग नांव बनाने तथा छाल का उपयोग चमड़ा पकाने तथा रंगने में किया जाता है.

इन वनों में ताड़, नारियल, फोनिक्स, नीपा, गोरने, मैन्ग्रोवा तथा सुन्दरी वृक्ष आते हैं.

ये वन गंगा- ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टाओं में पायी जाती हैं. गंगा तथा ब्रह्मपुत्र के डेल्टा में सुन्दरी नामक वृक्ष पाया जाता है इसलिए इसे सुंदर वन का डेल्टा भी कहते हैं.

5). पर्वतीय वन (Mountainous Forests)
ये वन हिमालय पर्वत पर उगते हैं. इनका विस्तार असम से कश्मीर तक है. ये वन ऊंचाई के साथ- साथ बदलते रहते हैं क्योंकि ऊंचाई के साथ- साथ जलवायु के तत्वों की मात्रा में अंतर आता जाता है.

इनमें ओक, देवदार और मैपिल के वृक्ष उगते हैं. 1800 से 3000 मीटर की ऊंचाई तक समशीतोष्ण कोणधारी वन उगते हैं.

हिमालय प्रदेश की लकड़ियाँ (Woods of the Himalayan Region)

1). श्वेत सनोवर

2). देवदार

3). चीड

4). नीला पाइन

5). स्प्रूस

6). वालनट

7). विलो

8). बर्च

9). साइप्रस

मानसूनी वनों की लकड़ियाँ

1). सागोन

2). साल

3). चंदन

4). सुन्दरी

5). आबनूस

सदापर्णी वनों की लकड़ियाँ

1). रोज वुड

2). एबोनी

3). गुर्ज़न

भारत के वन्य जीव

वन्यजीव से तात्पर्य प्रत्येक प्रकार के पादप व जंतु से है, जो कि जंगलों, रेगिस्तान, चरागाहों में पाए जाते हैं. वन्य जीव संरक्षण व प्रबंध कार्यों के लिए संपूर्ण देश में राष्ट्रीय उधान, अभ्यारण्य तथा जैव-मंडल रिजर्वों की स्थापना की गयी है. वन्य जीव के अंतर्गत जब किसी क्षेत्रीय प्राकृतिक इकाई में किसी विशेष जाती/ प्रजाति के वन्य प्राणी को संरक्षित किया जाता है तो उसे अभ्यारण कहते हैं.

जब जीवों के आवासीय प्रवास को संरक्षित किया जाता है तो उसे राष्ट्रीय उद्यान कहते हैं.

जब विशेष प्राकृतिक इकाई के समग्र पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित किया जाता है तो उसे जैव-मंडल रिजर्व की संज्ञा दी जाती है.

विश्व विरासत स्थल (World Heritage Site)

मानवता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल, जो आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित की जानी होती हैं, उन्हें विश्व विरासत स्थल के रूप में जाना जाता है. ऐसे महत्वपूर्ण स्थलों के संरक्षण की पहल यूनेस्को द्वारा की गयी है. इसके लिए एक अन्तराष्ट्रीय संधि जो कि विश्व सांस्कृतिक व प्राकृतिक विरासत का संरक्षण करती हैं जो 1972 से लागू हुई है.

विश्व विरासत समिति के अंतर्गत 3 श्रेणियों

1). प्राकृतिक विरासत स्थल
ऐसी विरासत जो भौगोलिक प्राकृतिक निर्माण का परिणाम हो या भौतिक व भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत सुंदर, वैज्ञानिक महत्व का स्थल, भौगोलिक महत्व वाली स्थल जो किसी विलुप्त जीव या वनस्पति का प्राकृतिक आवास हो.

2). सांस्कृतिक विरासत स्थल
इस श्रेणी की विरासत में स्मारक, स्थापत्य की इमारतें, मूर्तिकारी, चित्रकारी, स्थापत्य की झलक वाले शिलालेख, गुफा व वैश्विक महत्व वाले स्थान, इमारतों का समूह…..जो कि ऐतिहासिक, सौंदर्य, जातीय, मानव-विज्ञान या वैश्विक दृष्टि से ख्याति प्राप्त हो, को शामिल की जाती है.

3). मिश्रित विरासत स्थल
इस श्रेणी के अंतर्गत वे विरासत स्थल आते हैं जो कि प्राकृतिक व सांस्कृतिक दोनों रूप में महत्वपूर्ण होती हैं. भारत को विश्व विरासत सूची में 14 नवंबर 1977 में स्थान मिला था.

भारत के 7 प्राकृतिक विश्व विरासत स्थल

1). काजीरंगा नेशनल पार्क
यह असम के नागांव व गोलाघाट जिलों के मिकिर पहाड़ियों की तलहटी में ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट के साथ विस्तृत हैं. यह नेशनल पार्क एक सींग वाले (राइनोसेरोस) के लिए विश्व में जाना जाता है. यहाँ पर गैंडे की संख्या सबसे अधिक है. असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित इस पार्क में गैंडे के साथ साथ हाथी, चीता, बाघ, हिरन, डोल्फिन आदि हैं.

2). मानस वन्यजीव अभ्यारण
यह अभ्यारण असम में स्थित है. इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट के साथ साथ प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व, एलिफेंट रिजर्व आदि भी घोषित किया गया है. यह पार्क अपनी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है. इस अभ्यारण में एक सींग वाले गैंडे के साथ साथ हिमालयन भालू, बाघ, पिग्मी हॉग पाए जाते हैं.

3). केव्लादेवी नेशनल पार्क
यह राष्टीय उद्यान राजस्थान के भरतपुर जिले में हैं. 1982 में भरतपुर पक्षी अभ्यारण को नेशनल पार्क घोषित किया गया. इसका नाम बदलकर केवलादेव घना नेशनल पार्क रखा गया. इस पार्क में पक्षियों की लगभग 364 किस्मों का प्राकृतिक आवास है.

इसके अलावा यहाँ कछुआ, मछलियाँ, उभयचरों की कई प्रजातियाँ पाई जाती है. पक्षियों के अलावा काला हिरन, पायथन, सांभर, हिरन, नीलगाय पाए जाते हैं.

4). पश्चिमी घाट
यह क्षेत्र हिमालय के पर्वत से भी पुराने हैं. 1600 किमी. लम्बे पश्चिमी घाट की श्रेणी गुजरात में प्रारंभ होकर महाराष्ट्र, कर्नाटक होती हुई गोवा व केरल तक फैली है व कन्याकुमारी इसका अंतिम छोर है.

5). सुंदरवन नेशनल पार्क
पश्चिमी बंगाल के दक्षिणी भाग में गंगा नदी के सुंदरवन डेल्टा क्षेत्र में स्थित इस पार्क में रॉयल बंगाल टाइगर का निवास स्थल है. सुंदरवन पार्क 2 नदियों ब्रह्पुत्र व गंगा से घिरा हुआ है.

6). नंदा-देवी व वैली ऑफ़ फ्लावर
नंदा-देवी नेशनल पार्क उत्तराखंड के नंदा-देवी पर्वत पर स्थित है. यह क्षेत्र ऋषिगंगा के जल ग्रहण क्षेत्र में यह नदी धौली गंगा पूर्वी सहायक नदी है. जोशीमठ के पास घोलीगंगा व अलकनंदा का संगम इसी क्षेत्र में वैली ऑफ़ फ्लावर पार्क है. यहाँ भालू, कस्तूरी मुग, हिम तेंदुए, हिमालयन थार पाए जाते हैं.

7). ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क
ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र का प्रमुख आकर्षण है. यहाँ भालू, कस्तूरी हिरन, हिम तेंदुए, हिमालयन थार पाए जाते हैं. ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क कंजर्वेशन एरिया हेरिटेज साइट की सूची 2014 में शामिल किया गया.

साइट्स (CITES)

विलुप्त होते जीव- जंतुओं की सुरक्षा को लेकर विश्व के देशों ने 1973 में एक बहुपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर किये थे, जिसे साइट्स कहते हैं. इस सम्मेलन का आयोजन प्रत्येक 3 वर्ष पर होता है.

साइट्स का विकास
साइट्स को वाशिंगटन कन्वेंसन भी कहा जाता है. इसके कारण 3 मार्च 1973 को ही इस संधि पर वाशिंगटन में हस्ताक्षर किये गये थे. इसका मुख्य उद्देश्य विश्व में ऐसा तंत्र बनाना है, जिससे विलुप्त हो रहे जीव- जंतुओं के व्यापार आदि पर रोक लगाया जा सके.

भारत की कृषि व पशुपालन

कृषि
कृषि के लिए अंग्रेजी में एग्रीकल्चर शब्द प्रयुक्त होता है, जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के 2 शब्दों से हुई है. एग्री जिसका अर्थ मृदा और कल्चर का अर्थ कृषि है. इस प्रकार कृषि का अर्थ फसल उगाने के लिए मिट्टी की जुताई करना है.

मुख्य फसलें

चावल
चावल एक उष्ण कटिबंधीय फसल है व भारत की मानसूनी जलवायु में इसकी अच्छी कृषि की जाती है. यह देश की मुख्य खाधान फसल भी है. गर्म व आद्र जलवायु की उपयुक्त के कारण इसे खरीफ की फसल के रूप में उगाया जाता है. देश में खाधान के अंतर्गत आने वाले कुल क्षेत्र में 47% भाग पर चावल की कृषि की जाती है.

चावल की फसलें
अमन (शीतकालीन)

ऑस (शरदकालीन)

बोरो (ग्रीष्मकालीन)

चावल उत्पादक क्षेत्र
पूर्वी भारत का मैदानी प्रदेश जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिमी बंगाल आते हैं.

गेंहू
चावल के बाद देश का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण खाघान है. देश की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 10% भाग पर गेंहू की कृषि की जाती है, किंतु चावल की अपेक्षा इसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक है. इसकी अधिकाँश कृषि सिंचाई के द्वारा की जाती है.

हरित क्रांति का सबसे अधिक प्रभाव गेंहू की खेती पर ही पडा है. इसके प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा में हरित क्रांति के प्रयोगों से उच्च उत्पादकता तथा उत्पादन की मात्रा अधिक प्राप्त की गयी है.

जौ
जौ की गणना मोटे अनाजों में की जाती है, किंतु यह भी देश की एक महत्वपूर्ण खाघान फसल है. यह शुष्क व बलुई मिट्टी में बोया जाता है तथा शीत व नमी को अवशोषित करने की क्षमता भी अधिक होती है.

इसका प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है जबकि बिहार राज्य के कृषि के 5% भाग पर जौ की खेती की जाती है.

ज्वार
ज्वार भी एक मोटा अनाज है जिसकी खेती सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई के की जाती है. इसके लिए उपजाऊ जलोढ़ अथवा चिकनी मिट्टी काफी उपयुक्त है, किंतु लाल, पीली, हल्की व भारी दोमट तथा बलुई मिट्टियों में भी इसकी कृषि की जाती है.

बाजरा
बाजरा की गणना भी मोटे अनाजों में की जाती है और यह वास्तव में ज्वार भी शुष्क परिस्थितियों में पैदा किया जाता है. इसकी खेती के लिए 40 से 50 सेमी. तक की वर्षा व बलुई मिट्टी उपयुक्त होती है. वर्षा की हल्की व लगातार होने वाली फुहारें इसके लिए काफी उपयुक्त होती हैं. राजस्थान व गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में बाजरे की खेती अधिक कृषि की जाती है.

मक्का
देश की अपेक्षाकृत शुष्क भागों में मक्का का उपयोग प्रमुख खाघान के रूप में किया जाता है. इसके लिए लंबा गर्मी का मौसम, खुला आकाश तथा अच्छी वर्षा आवश्यक होती है.

25 डिग्री सेंटीग्रेड से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान और 50 सेमी. तक की वर्षा वाले क्षेत्र तथा नाइट्रोज़न युक्त गहरी दोमट मिट्टी में इसकी अच्छी खेती की जाती है. देश में मक्के का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है.

दालें
शाकाहारी भोजन पसंद करने वाली जनसंख्या के लिए प्रोटीन प्राप्ति का सबसे प्रमुख साधन दालें हैं. देश में रबी बी खरीब दोनों फसलें के अंतर्गत दालों की खेती की जाती है.

रबी की फसल के समय बोई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलें हैं. अरहर, चना, मटर, मसूर आदि रबी की फसलें, जबकि मुंग, लोबिया आदि की खेती खरीफ के समय की जाती हैं.

दलहनी फसलें
दलहनी फसलों की दृष्टि से भारत की प्रमुख विशेषता यह है कि इनकी कृषि अनउपजाऊ मिटटी व वर्षा की भारी कमी वाले क्षेत्रों में ही की जाती है. चने की खेली गंगा तथा सतलज नदियों की उपरी घाटी व उसके समीपवर्ती मध्य प्रदेश राज्य तक सीमित है.

इसका सबसे सघन क्षेत्र उत्तर प्रदेश के आगरा तथा मिर्जापुर जिलों के बीच पाया जाता है, जबकि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात आदि प्रमुख उत्पादक राज्य हैं.

नकदी फसलें

गन्ना
संपूर्ण विश्व के गन्ना उत्पादक देशों में भारत का प्रथम स्थान है और यहाँ विश्व का लगभग 40% गन्ना पैदा किया जाता है.

गन्ने की फसल तैयार होने में लगभग एक वर्ष का समय लग जाता है और उपोष्ण कटिबंधीय फसल होने के कारण इसके लिए 20 डिग्री से 27 डिग्री का औसत वार्षिक तापमान तथा 100 सेमी. से 200 सेमी. की औसत वार्षिक वर्षा उपयुक्त होती है.गन्ने की फसल तैयार होते समय वर्षा का अभाव काफी लाभदायक होता है क्योंकि इससे शर्करा की मात्रा में वृद्धि हो जाती है.

समुद्र-तटीय जलवायु वाले क्षेत्रों में जलवायविक समानता के कारण दक्षिण भारत का गन्ना काफी मोटा व अधिक रस वाला होता है, लेकिन मिट्टी की अनुपयुक्तता के कारण इसकी सर्वाधिक खेती उत्तर भारत में ही की जाती है.

 रबड़
देश में रबड़ की खेती का प्रारंभ 1900 में मारक्किस ऑफ़ सेलिसबरी के प्रयासों से हुआ. इसी वर्ष ब्राजील के पारा क्षेत्र से रबर का बीज लाकर केरल में पेरियार नदी के किनारे लगाये गये. इसकी उत्तम खेती के लिए 25 से 32 डिग्री तक का तापमान, अत्यधिक वर्षा, लाल चिकनी दोमट मिट्टी तथा अधिक मानव- श्रम की आवश्यकता होती है.

पशुपालन
भारत देश की अधिकाँश जनसंख्या शाकाहारी है. देश के अधिकाँश किसान एक या दो दुधारी पशु पालते हैं जो खुद के उपयोग हेतु दूध का उत्पादन करते हैं, किंतु किसान जो किसान अधिक दुधारी जानवरों को पालते हैं वो सरकार द्वारा चलाई जा रही सहकारी समितियों को भी दूध बेचते हैं.

दुग्ध उद्योग राज्य सूची में आता है, किंतु 1970 से एक ऑपरेशन फ्लड योजना शुरू की गयी जो कृषि व सहकारिता विभाग की देख- रेख में कार्य करती है.

गायों की नस्लें

भारवाही नस्लें
ये नस्लें शक्तिशाली तथा मजबूत होती हैं. इनका उपयोग बैलगाड़ी खींचने, खेत में हल चलाने तथा सामान लाने ले जाने में किया जाता है. इस नस्ल की गायें दूध कम देती हैं.

दुधारी नस्लें
इस नस्ल की गायें अधिक दूध देती हैं और इनके बछड़े भारवाही कार्य योग्य नही होते हैं.

दिउद्देशीय नस्लें
इस नस्ल की गायें संतोषजनक मात्रा में दूध देती हैं तथा इनके बछड़े भी बोझा ढोने में कुशल होते हैं.

देशी नस्ल की गायें मुख्य रूप से 3 प्रकार की होती हैं.

* रेड सिन्धी

* साहीवाल

* गिर

भारत के खनिज संसाधन

खनिज एक प्रकार के प्राकृतिक संसाधन हैं जिनकी रचना एक से अधिक तत्वों के संयोजक व प्राप्त शेलों से होती है. भू- गर्भिक संपदा को खनन (गहराई के साथ की गयी खुदाई)/ उत्खनन (उपरी परत की खुदाई) के द्वारा प्राप्त किया जाता है. कम गहराई वाली खानों को खुली खदान तथा अधिक गहराई वाली खानों को कूप खदान कहते हैं.

भारत के प्रमुख खनिज

उत्तरी पूर्वी प्रायदिपीय क्षेत्र
यह क्षेत्र भारतीय खनिज की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. इसे भारतीय खनिज का ह्रदय- स्थल कहा जाता है. इस क्षेत्र में काइनाइट 100%, लौह- अयस्क 93%, कोयला 84%, क्रोमाईट 70% आदि मिलते हैं.

मध्य क्षेत्र
यह भारत का दूसरा सर्वाधिक खनिज क्षेत्र है. इसका विस्तार मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और पूर्वी महाराष्ट्र के क्षेत्र तक है.

इस क्षेत्र में मुख्य मेंगनीज़, बाक्साइड, कोयला, लौहअयस्क, ग्रेफाइड, चूना- पत्थर आदि पाए जाते हैं.

दक्षिण क्षेत्र
इस क्षेत्र में कर्नाटक का पठार और तमिलनाडु का उच्च क्षेत्र शामिल है. यहाँ लौह- अयस्क, मेंगनीज़, क्रोमाईट आदि खनिज प्राप्त होते हैं.

उत्तरी- पश्चिमी क्षेत्र
इस क्षेत्र के अंतर्गत अरावली के क्षेत्र तथा गुजरात के भाग आते हैं. इसे यूरेनियम, अभ्रक तथा खनिज तेल के क्षेत्र के रूप में जाना जाता है. यहाँ अलौह खानिजें, जिनमें मुख्य रूप से तांबा, सीसा, ज़स्ता आदि शामिल हैं.

प्रमुख खनिज़ संसाधन (Major Mineral Resource)

1). लौह अयस्क (Iron Ore)
देश में कुडप्पा तथा घारवाह युग की जलीय व आग्नेय शेलों में लौह अयस्क की प्राप्ति होती है. इनमें मैग्नेटाइट, लिमोनाइट तथा लैटेराइट अयस्क प्रमुख हैं. देश में सर्वाधिक शुद्धता वाला मैग्नेटाईट अयस्क (72% शुद्धता) पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है.

देश में उपलब्ध लौह अयस्क में से 85% हैमेटाईट, 8% मैग्नेटाईट और 7% अन्य किस्म का लोहा पाया जाता है.

2). मैंगनीज़
लौह इस्पात उद्योग में एक प्रमुख कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त होने वाली धातु मैंगनीज़ काले रंग की प्राकृतिक भस्मों के रूप में अवसादी चट्टानों में पायी जाती है. देश में मिलने वाले मेंगनीज़ अयस्क में दातु का अंश 52% तक पाया जाता है. मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र देश के प्रमुख मेंगनीज़ उत्पादक राज्य हैं.

यहाँ 15 किमी. चौड़ी तथा लगभग 205 किमी. लम्बी पेटी में मेंगनीज़ का जमाव है, जो पश्चिम में महाराष्ट्र के नागपुर व भंडारा जिलों तक विस्तृत है.

3). तांबा
देश में ताबे की प्राप्ति आग्नेय, अवसादी व कायांतरित तीनों प्रकार की चट्टानों में नसों के रूप में होती है, जिसमें कई प्रकार के पदार्थ मिले रहते हैं.

लाल व भूरे रंग का खनिज तांबा विधुत का उत्तम संचालक होने के कारण विद्युत कार्यों में अधिक उपयोग में लाया जाता है. भारत में मिलने वाली तांबा खनिज की चट्टानों में शुद्ध धातु का अंश मात्र 1% से 3% तक ही पाया जाता है.

झारखंड का सिंह-भूम जिला तांबा उत्खनन की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. यहाँ से ओडिशा राज्य तक लगभग 140 किमी. लम्बी पट्टी में तांबा खनिज मिलता है.

4). बाक्साइड
एलुमिनियम की प्राप्ति का श्रोत होने के कारण बाक्साइड की गणना महत्वपूर्ण खनिजों में की जाती है. इसकी प्राप्ति लौह भस्मों के रूप में होती है जिनमें प्रमुख हैं- बोमाइट, डायस्फोर तथा गिबराइट. देश में मिलने वाले ये सभी भस्म लैटेराईट प्रकार के हैं, जिनमें लाल व पीला लौहांश अधिक मात्रा में मिला रहता है.

5). सोना
सोने गणना बहुमूल्य घातुओं में की जाती है व इसका उपयोग अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आदान- प्रदान के रूप में तथा आभूषणों के निर्माण में किया जाता है. यह कभी भी शुद्ध नही मिलता, इसमें चांदी व अन्य घातुओं के अंश मिले रहते हैं.

देश में सोने की बहुत कम मात्रा की प्राप्ति होती है जिसके कारण इसकी मांग व मूल्य दोनों ही अधिक हैं. देश के कुल स्वर्ण उत्पादन का लगभग 98% भाग अकेले कर्नाटक राज्य की कोलार तथा हट्टी की स्वर्ण खानों से प्राप्त किया जाता है.

6). अभ्रक
अभ्रक एक बहु-उपयोगी खनिज है जो आग्नेय व कायांतरित चट्टानों में खण्डों के रूप में पाया जाता है. बायोटाइट अभ्रक का रंग गुलाबी होता है. अभ्रक के उत्पादन में देश का विश्व में प्रथम स्थान है. यहाँ से विश्व में मिलने वाली अच्छी किस्म की अभ्रक का 60% से भी अधिक उत्पादन किया जाता है और देश के उत्पादन का अधिकाँश भाग विदेशों को निर्यात कर दिया जाता है.

आंध्र प्रदेश में 67% संसाधन भंडार है, इसके बाद बिहार में 22%, राजस्थान में 8% तथा झारखंड में 3% है.

क्षेत्र-फल की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है— सातवाँ

जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है— दूसरा

कर्क रेखा भारत के जितने राज्यों से होकर जाती है उनकी संख्या— 8 

भू-मध्य रेखा के निकट है— इंदिरा प्वाइंट

इंदिरा प्वाइंट कहा  है— अंडमान–निकोबार द्वीप समूह में

जिस राज्य की समुद्र तट-रेखा सबसे छोटी है वह है— गोवा

भारत के उत्तर में कौन-कौन-से देश हैं— चीन, नेपाल, भूटान

भारत के पूर्व में कौन-सा देश है— बांग्लादेश

जिस राज्य की समुद्र तटरेखा सबसे लंबी है वह है— गुजरात

भारत की स्थल सीमा जिस देश से सबसे ज्यादा है वह है— बांग्लादेश के साथ

भारत का कौन–सा भू–आकृतिक भाग प्राचीन है— प्रायद्वीपीय पठार

भारत के पूर्वी समुद्र तट को क्या कहते है— कोरोमंडल तट

भारत के किस स्थान को ‘सफेद पानी’ के कहते है— सियाचिन

भारत में शीत मरूस्थल— लद्दाख

भारत की देशांतर स्थिति— 68°7’ से 97°25’ तक

भारत के पश्चिम में कौन-सा देश है— पाकिस्तान

भारत के दक्षिण पश्चिम में कौन-सा सागर है— अरब सागर

कोंकण तट कहाँ से यहाँ तक स्थित है— गोवा से दमन तक

लक्षद्वीप समूह के द्वीपों की उत्पत्ति कैसे हुई— प्रवाल द्वारा

न्यू मूर द्वीप है— अंडमान सागर में

कौन सी द्वीप भारत व श्रीलंका के बीच है रामेश्वरम्

लक्षद्वीप समूह के कुल द्वीपों की संख्या— 36 

लक्षद्वीप समूह में कुल कितने द्वीपों पर मानव रहते है— 10

भारत के दक्षिण-पूर्व में कौन-सी खाड़ी है— बंगाल की खाड़ी

भारत के दक्षिण में कौन-सा महासागर है— हिन्द महासागर

पूर्वांचल की पहाड़ियाँ भारत को किस देश से अलग करती हैं— म्यांमार से

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह कहाँ स्थित है— बंगाल की खाड़ी में

मन्नार की खाड़ी और पाक जलडमरूमध्य भारत को किस देश से अलग करते हैं— श्रीलंका से

संपूर्ण भारत की अंक्षाशीय विस्तार कितना है— 8° 4’ से 37°6’ उत्तरी अक्षांश

भारत के मध्य से कौन-सी रेखा गुजरती है— कर्क रेखा

भारत के उत्तर से दक्षिण तक विस्तार कितना है— 3214 किमी

भारत का पूर्व से पश्चिम तक विस्तार कितना है— 2933 किमी

भारत का भूगोल GEOGRAPHY OF INDIA IN HINDI pdf                             Download Here

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